जलवायु परिवर्तन से बढ़ रहा हिमस्खलन का खतरा, पांच वर्षों में 661 घटनाएं दर्ज
हिमालयी क्षेत्रों में हिमस्खलन (एवलांच) की घटनाओं पर लगातार नजर रखी जा रही है। मौसम से जुड़ी सटीक जानकारी जुटाने के लिए संबंधित विभागों द्वारा कर्मियों को संवेदनशील इलाकों में भेजा जाता है। डीजीआरई (रक्षा भू-भौतिकीय अनुसंधान प्रतिष्ठान) के वैज्ञानिक डॉ. सुधांशु शेखर के अनुसार, एकत्र किए गए डेटा को चंडीगढ़ सेंटर भेजा जाता है, जहां सुपर कंप्यूटर और विभिन्न मॉडलों के माध्यम से मौसम और हिमस्खलन का पूर्वानुमान जारी किया जाता है।
डॉ. शेखर ने बताया कि वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और सिक्किम में कुल करीब 661 हिमस्खलन की घटनाएं दर्ज की गईं। यानी औसतन हर साल लगभग 132 घटनाएं सामने आईं। ये केवल रिपोर्ट की गई घटनाएं हैं, वास्तविक संख्या इससे अधिक भी हो सकती है।
आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि में सबसे अधिक 500 घटनाएं जम्मू-कश्मीर में दर्ज की गईं, जबकि हिमाचल प्रदेश में 150 हिमस्खलन की रिपोर्ट हुई। उत्तराखंड में 10 बड़े हिमस्खलन की जानकारी सामने आई, वहीं सिक्किम में औसतन एक घटना दर्ज की गई। इसके अलावा, नॉर्थ ईस्ट के अन्य राज्यों में भी अब हिमस्खलन की घटनाओं का अध्ययन शुरू कर दिया गया है।
डॉ. शेखर ने बताया कि हिमस्खलन की साइटों की संख्या भी अलग-अलग राज्यों में चिह्नित की गई है। जम्मू-कश्मीर में सबसे अधिक करीब 1000 एवलांच साइट, हिमाचल प्रदेश में 200, जबकि उत्तराखंड में 100 साइट चिह्नित की जा चुकी हैं।
उन्होंने कहा कि हिमस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं या घट रही हैं, यह काफी हद तक रिपोर्टिंग पर निर्भर करता है। हालांकि, यह स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन के कारण कम समय में अधिक बर्फबारी हो रही है, जिससे हिमस्खलन का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है।

