गैरसैंण को स्थायी राजधानी का इंतजार, बुनियादी सुविधाओं की कमी से लोग परेशान

चमोली/देहरादून: उत्तराखंड राज्य गठन के 25 वर्ष बाद भी Gairsain के लोगों को स्थायी राजधानी के साथ-साथ बुनियादी सुविधाओं का इंतजार है। स्थानीय लोगों का कहना है कि ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किए जाने के बावजूद यहां अपेक्षित विकास नहीं हो पाया है।

गैरसैंण में भव्य विधानसभा भवन तो बना है, लेकिन उसके आसपास जरूरी सुविधाओं का अभाव बना हुआ है। राज्य आंदोलन के दौरान यह तय किया गया था कि अलग राज्य बनने पर गढ़वाल और कुमाऊं के बीच स्थित गैरसैंण को राजधानी बनाया जाएगा। वर्ष 1992 में चंद्रनगर क्षेत्र में इसे राजधानी के रूप में शिलान्यास भी किया गया था।

स्थानीय निवासियों का कहना है कि वर्षों बाद भी सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और प्रशासनिक सुविधाओं का पर्याप्त विकास नहीं हो पाया है। आज भी Karnaprayag से गैरसैंण तक सड़क सिंगल लेन है, जिससे आवाजाही में परेशानी होती है।

लोगों के अनुसार मोबाइल नेटवर्क की समस्या भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। कई बार सिग्नल न मिलने से संचार व्यवस्था प्रभावित रहती है। वहीं, यहां आने वाले लोगों के ठहरने के लिए पर्याप्त व्यवस्था भी नहीं है। कई बार विधानसभा सत्र के दौरान लोगों को रात में रुकने के लिए 60-65 किलोमीटर दूर कर्णप्रयाग या अन्य स्थानों पर जाना पड़ता है।

स्थानीय महिलाओं का कहना है कि सरकार की कई योजनाएं अभी तक यहां तक नहीं पहुंच पाई हैं। महिलाओं के लिए चलाई जा रही योजनाओं का लाभ भी ग्रामीणों को नहीं मिल पा रहा है, जिससे उनकी समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी तो घोषित किया गया है, लेकिन यह सिर्फ कागजों में ही दिखाई देता है। उनका मानना है कि यदि सरकार वास्तव में इसे राजधानी के रूप में विकसित करना चाहती है तो यहां बुनियादी ढांचे, सड़क, स्वास्थ्य और प्रशासनिक सुविधाओं को प्राथमिकता देनी होगी।

स्थानीय लोगों का यह भी आरोप है कि कई विधायक और अधिकारी विधानसभा सत्र के दौरान भी यहां ज्यादा समय तक रुकना नहीं चाहते और सत्र समाप्त होने से पहले ही Dehradun लौट जाते हैं। ऐसे में लोगों को लगता है कि गैरसैंण अब भी विकास की मुख्यधारा से दूर है।

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